विश्वपति वर्मा ;
लोकसभा में 27 दिसंबर, 2011 को लोकपाल विधेयक पास होने के बाद आखिर ऐसी कौन सी बिपदा आ गई है कि लोकपाल विधेयक कानून को लागू नहीं किया जा रहा है ,जबकि वर्तमान की भारतीय जनता पार्टी की सरकार 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पूरा चुनाव भ्रष्टाचार और गरीबी का हवाला देकर लड़ी है इसी लोकलुभावन भाषण के कारण भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित जीत हासिल हुई लेकिन केंद्र की मोदी सरकार को ऐसा कौन सा टोना लग गया है कि सरकार उन सभी गंभीर मुद्दों को भूल गई है जिसे वह यूपीए सरकार की बिफलताओं का स्मारक मानते हुए देश की जनता से वोट के बदले बदहाल व्यवस्था को सुधारने के लिए अपील कर रही थी ।
बस कुछ ही महीनों बाद केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल का 4 साल पूरा होने जा रहा है परन्तु अभी तक के बीते 4 सालों में सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिसकी वजह से आम आदमी को सरकारी कार्यों को कराने में सहजता उत्पन्न हुई हो बल्कि देखने में आ रहा है कि पिछले वर्षों की अपेक्षा नई सरकार के कार्यकाल में आम आदमी को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
जन लोकपाल बिल भारत में नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित भ्रष्टाचारनिरोधी बिल का मसौदा है। यह सशक्त जन लोकपाल के स्थापना का प्रावधान करता है जो चुनाव आयुक्त की तरह स्वतंत्र संस्था होगी। जन लोकपाल के पास भ्रष्ट राजनेताओं एवं नौकरशाहों पर बिना किसी से अनुमति लिये ही अभियोग चलाने की शक्ति होगी। भ्रष्टाचार विरोधी भारत (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) नामक गैर सरकारी सामाजिक संगठन का निमाण करेगे.संतोष हेगड़े, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद तैयार किया था। इसे लागू कराने के लिए सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी अन्ना हजारे के नेतृत्व में २०११ में अनशन शुरु किया गया। १६ अगस्त में हुए जन लोकपाल बिल आंदोलन २०११ को मिले व्यापक जन समर्थन ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली भारत सरकार को संसद में प्रस्तुत सरकारी लोकपाल बिल के बदले एक सशक्त लोकपाल के गठन के लिए सहमत होना पड़ा।
इतना सब कुछ होने के बाद भी भ्रष्टाचार पर ढोल पीटने वाले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शक्तियां भी कमजोर होती दिखाई दे रही हैं ,अगर नरेंद्र मोदी वास्तव में देश के गरीब शोषित एवं वंचित वर्ग के मसीहा हैं तो उन्हें आधुनिक चकाचौंध से बाहर निकलकर ,जनलोकपाल कानून को लागू करने के लिए आगे आना चाहिए।
- इस नियम के अनुसार केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।
- यह संस्था निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी।
- किसी भी मुकदमे की जांच ३ महिने के भीतर पूरी होगी। सुनवाई अगले ६ महिने में पूरी होगी।
- भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को १ साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
- भ्रष्टाचार के कारण से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा।
- अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति के तौर पर मिलेगा।
- लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीश, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।
- लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।
- सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा।
- लोकपाल को किसी भी भ्रष्ट जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।

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