ग्राउंड रिपोर्ट
विश्वपति वर्मा ;
विश्वपति वर्मा ;
जब धरती से लोग हवा में उड़ने लगे हैं ,वैज्ञानिक अंतरिक्ष में परचम लहराने लगे हैं ,जीवन रक्षक दवाओं से वीवीआईपी लोगों की जान बचाई जाने लगी है तब उसी देश में बहुसंख्यक आबादी झुग्गी -झोपडी में नरकीय जिंदगी जीने को मजबूर है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ जो किसी ज़माने में नवाबों का शहर हुआ करता था ,उस शहर में एक बड़ी आबादी गंदे नालों एवं रेलवे के किनारों में तम्बू टांग कर किसी तरहं से जीवन जी रहे रहे हैं ,राजधानी के कुकरैल नाले के किनारे हजारों परिवार तम्बू बना कर रहते हैं ,वंही निशातगंज ,चारबाग टेढ़ीपुलिया समेत राजधानी के दिल हजरतगंज के इलाके में भारी संख्या में लोग तम्बू बनाकर कई दशकों से जीवन की नैय्या पार कर रहे हैं।
आज हमने नगर की झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में जाकर लोगों के बारे में अपने अनुभव में पाया कि झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में रह रहे लोगों की दरिद्रता एवं दुर्दशा गांव के लोगों से बदतर है ,गांव के लोगों में पाया गया है कि कितने भी टूटे -फूटे एवं घास फूस के बने मकान क्यों न हो लेकिन उनके साथ बैठने एवं उनके बर्तन में खाने -पीने से परहेज नहीं करेंगे। लेकिन आज मसलन यानी झुग्गी झोपड़ियों की यात्रा के बाद मुझे देश के नेताओं पर शर्म आने लगी ,घनघोर दलिद्रता ,गंदे एवं बदबूदार रहन -सहन को देख कर, कि आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद इस तरहं से जीवन यापन करने वाले परिवारों के संतुलित विकास के बारे में ध्यान नहीं दिया गया।
झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में जाकर अपने अध्ययन के दौरान मै अनेक लोगों से मिला , जो चाहते थे कि उन्हें बेहत्तर दशाओं में जीने का मौका मिले ,उन लोगों से बात करने दौरान हम यह समझ पाए कि ये चाहते हैं की इनके झुग्गी -झोपड़ियों को हटाकर इन्हे आवास का लाभ मिले ,ताकि स्वस्थ्य जिंदगी की शुरुआत करते हुए रोजगार एवं विकास के साधन तलाशें। लेकिन जिम्मेदारों की निरंकुशता की वजह से भयावह जिंदगी जीने के लिए लाखों लोग मजबूर हैं।
हम ही नहीं कोई भी व्यक्ति मलिन बस्तियों की दशा देखकर बेहद व्यथित हो जायेगा और झल्लाहट में उसके मुख से जिम्मेदारों के प्रति गुस्सा फूट पड़ेगा। गुस्सा आयेगा भी क्यों नहीं अगर कोई व्यक्ति खुले आसमान के नीचे खानाबदोश जैसी जिन्दगी बसर करे , वंहा रह रहे लोगों को शिक्षा ,चिकित्सा,राशन ,पेय जल की उपलब्धता न हो पाए वंही दूसरी तरफ सदन में 92 घंटे कामकाज ठप कर 144 करोड़ रुपया बर्बाद कर दी जाये।
यंहा रह रहे लोगों की बात यहीं खत्म नहीं होती इन बस्तियों में बड़ी संख्या में अबांछित तत्व घुसपैठ कर चुके हैं। इनमें नशीले पदार्थों का धंधा करने वाले, तस्कर और गुंडे-माफिया शामिल हैं। इन बस्तियों में रहने वाले शरीफ लोग भी बदनाम हो जाते हैं। क्योंकि इस बदहाली के आड़ में देह व्यापर का धंधा भी सक्रीय रहता है।
हमने पाया कि गाँव से बड़ी संख्या में लोग स्थानीय परेशानियों के कारण शहरों की ओर रूख करते हैं. जनपद में पंजीकृत तथा गैरपंजीकृत झुग्गी-झोपडि़यों में लाखों लोग रह रहे हैं। नगर की झुग्गी-झोपड़ी व्यक्ति को प्रभावित करतीं हैं और व्यक्ति को बुरी तरह हिलाकर रख देतीं हैं। ये व्यक्ति का दिल बाँध देतीं हैं। इनका वर्णन किया जाना संभव नहीं।जो असाधारण घनत्व और बेपनाह दरिद्रता तथा प्रदूषण की मार झेल रही हैं।
देश के नगरों एवं गाँवों को स्वच्छ एवं स्वस्थ्य बनाने का सपना भारतवासियों की सहभागिता के बिना पूरा नहीं हो सकता। अतः नागरिकों को संवेदनशील, ईमानदार एवं अनुशासित होना होगा। इसके साथ सत्ताधारियों को गंभीर होना होगा कि देश के नागरिकों को संबिधान की प्रस्तावना के आधार पर समता ,स्वतंत्रता ,बंधुता एवं न्यायाधारित समाज की स्थापना कर उन्हें स्वच्छ एवं स्वस्थ्य जिंदगी जीने का अवसर प्रदान करें। अन्यथा यह कहने में गुरेज नहीं होगा कि जिस लखनऊ में नवाब रहते थे वह लखनऊ आजादी के 70 साल बाद अब झुग्गी झोपड़ियों के ढेर पर बसने लगा है।
हमने पाया कि गाँव से बड़ी संख्या में लोग स्थानीय परेशानियों के कारण शहरों की ओर रूख करते हैं. जनपद में पंजीकृत तथा गैरपंजीकृत झुग्गी-झोपडि़यों में लाखों लोग रह रहे हैं। नगर की झुग्गी-झोपड़ी व्यक्ति को प्रभावित करतीं हैं और व्यक्ति को बुरी तरह हिलाकर रख देतीं हैं। ये व्यक्ति का दिल बाँध देतीं हैं। इनका वर्णन किया जाना संभव नहीं।जो असाधारण घनत्व और बेपनाह दरिद्रता तथा प्रदूषण की मार झेल रही हैं।
देश के नगरों एवं गाँवों को स्वच्छ एवं स्वस्थ्य बनाने का सपना भारतवासियों की सहभागिता के बिना पूरा नहीं हो सकता। अतः नागरिकों को संवेदनशील, ईमानदार एवं अनुशासित होना होगा। इसके साथ सत्ताधारियों को गंभीर होना होगा कि देश के नागरिकों को संबिधान की प्रस्तावना के आधार पर समता ,स्वतंत्रता ,बंधुता एवं न्यायाधारित समाज की स्थापना कर उन्हें स्वच्छ एवं स्वस्थ्य जिंदगी जीने का अवसर प्रदान करें। अन्यथा यह कहने में गुरेज नहीं होगा कि जिस लखनऊ में नवाब रहते थे वह लखनऊ आजादी के 70 साल बाद अब झुग्गी झोपड़ियों के ढेर पर बसने लगा है।

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