लेखक -राम करन;
बलात्कार या अन्य अपराध के लिए सजा का प्रावधान क्या अपराध को रोकने में सक्षम है? इतिहास उठा कर देखेंगे तो उत्तर मिलेगा कि कठोर दंड के बावजूद ऐसी घटनाएं शाश्वत रही है। कुछ समाज में तो इसके लिए अत्यंत भयावह दण्ड का प्रावधान रहा है , जिसकी चर्चा करके समय नही बर्बाद किया जा सकता । बस इतना ही निष्कर्ष पर्याप्त है कि कोई भी डर भय या लालच से क्राइम घटता नही है। क्योंकि जब व्यक्ति गुनाह करता है तो उसपर कोई अन्य मनोदशा हावी होता है, न कि वह सजा के विषय पर विचार करता है।
अब सवाल यह है कि हम गम्भीरता से अपराधों के उन्मूलन पर विचार करें अथवा दण्ड के प्रावधान पर। निश्चित है कि समाज अपराध के क्षरण से अधिक सन्तुष्ट होगा। अगर अपराध पर ही नियंत्रण हो जाय तो सजा पर बहस छिड़े ही नही।
अपराध है तो सजा होगा परन्तु सजा है तो यह इस बात की गारंटी नही देता कि समाज अपराध मुक्त हो जायेगा । किन्तु असंतोष है तो विघटनकारी गतिविधियां रहेंगी। फिर क्यों न हम व्यक्ति , समूह लिंग आधारित समरसता पर विचार करें। एक बात और हमे जानना होगा कि हर व्यक्ति को संतुष्ट कर पाना भी दिवास्वप्न है।
अपूर्णता विद्रोह और हिंसा की तरफ प्रेरित करती है और पूर्णता आ नही सकती। ऐसे में हम मनोविज्ञान का आश्रय ले सकते है। व्यक्ति , समाज और समूह की प्रवृत्तियों को समझते हुए उसके चोटिल स्वाभिमान के लिए मनोवैज्ञानिक काउंसेलर का अनुलेपन लगाया जा सकता है। जिसकी व्यवस्था हमारे देश में अभी तक अपर्याप्त है। स्कूल, कॉलेज, विश्विद्यालय ही नही वरन सामुदायिक केंद्रों तक लोगो नकारात्मक मनोवृत्तियों को, आपराधिक स्वाभाव के व्यक्ति के व्यक्ति की ऊर्जा को सकारात्मक कार्यो में लगाने वाली व्यवस्था समाज में उल्लेखनीय समरसता ला सकती है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि दंडविधान के द्वारा विक्टिम को हम कुछ हदतक तो संतोष प्रदान कर सकते है पर उसकी भरपाई नही कर सकते। जबकि निवारक उपायों से ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

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