विश्वपति वर्मा ;
देश की जनता सरकार को आयकर देने के साथ उपकर भी देती है जो टूथपेस्ट से लेकर पेट्रोल ,डीजल खरीदने वाले सभी ग्राहकों को देना होता है ।
आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो देश मे लगभग 3 करोड़ लोग आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं ,वंही जीएसटी के आंकड़े पर यह संख्या काफी बढ़ जाएगी ।
उपकर का मतलब होता है जो किसी विशेष योजना के नाम पर खर्च करने के लिए बाजार में बिकने वाली सामानों पर "सेस टैक्स" लगाकर वसूला जाए।
सेस टैक्स के रूप में देश की जनता को 3 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत या उससे अधिक का टैक्स सरकार को अदा करना पड़ता है ।
बीते साल तक जीएसटी से पहले भारत में 20 सेस लागू थे, जैसे स्वच्छ भारत सेस, कृषि कल्याण सेस, क्लीन एनर्जी सेस और एजुकेशन सेस आदि। ये सभी सेस किसी न किसी उद्देश्य के चलते लगाए गए हैं
हालांकि यह आश्चर्यजनक है कि तमाम मुहिमों के लिए जुटाई गई इस राशि में से बड़ा हिस्सा अब भी खर्च नहीं हो सका है। नियंत्रक एवं लेखा महापरीक्षक (कैग) के मुताबिक 2016-17 तक 6 बड़े सेस के जरिए सरकार ने 4 लाख करोड़ रुपये की राशि जुटाई थी।
दिलचस्प बात यह है कि मोदी सरकार द्वारा चलाई गई स्वच्छ भारत मिशन योजना पर भी यह पैंसा अपर्याप्त खर्च किया गया जिसके चलते गली गांव से लेकर शहर तक गंदगियों का अंबार लगा हुआ है।
कृषि की बात करें तो सरकार भले ही किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रही है लेकिन धरातल पर देखा जाए तो अभी किसानों के लिए ऐसी कोई महत्वाकांक्षी योजना नही बनाई गई जिससे किसान सुखमय जीवन यापन कर सकें।
इसी तरहं से शिक्षा की बात की जाए तो सरकार अपने चार साल के कार्यकाल में न तो परिषदीय विद्यालयों की शिक्षा में बदलाव के लिए नई शिक्षा नीति बना पाई है और न ही उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने और रोजगारपरक बनाने के लिए कोई कदम उठा पाई है ।
इन सब विसंगतियों से यह स्पष्ट है कि सरकार आयकर और उपकर के माध्यम से अपनी तिजोरी भर रही लेकिन जनता के लिए बुनियादी सुविधाओं के लिए वह जरा भी गंभीर नही है ।जबकि जनता के जेब पर सरकार को टैक्स देने के लिए लगातार बोझ बढ़ रहा है।

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