ब्यूरो गोरखपुर - कृपा शंकर चौधरी
देश
को आजाद हुए 70 वर्ष से अधिक हो गया किन्तु किसी भी सरकार ने किसानों के
प्रति दूरदृष्टी नीति नहीं बनाया जिसका नतीजा यह है कि अन्नदाता कहे जाने
वाला किसान बदहाली की स्थिति में पहुंच गया है और अपना अस्तित्व बचाने के
लिए सड़कों पर उतरने के लिए बेबस है। विचारणीय विषय यह है कि हम जानते हैं
कि भारत में लोग 70 प्रतिशत से ज्यादा कृषि पर निर्भर है तब भी सरकार के
द्वारा कारगर नीति नहीं बनाई गई और देश के किसानों का विकास न सोच वाहरी
लोगों पर पूरे देश को निर्भर करने पर अग्रसर हैं।
आजादी
के प्रारंभिक कुछ वर्षों में प्रथम पंचवर्षीय योजना से छठे पंचवर्षीय
योजना तक सिंचाई , उद्योग , खनिज पर सरकार द्वारा धन व्यय किया गया किन्तु
आगे की योजनाओं में कृषि से परे हटकर रोजगार, गरीबी आदि पर ध्यान दिया जाने
लगा और योजनाकार भूल गए कि बिना कृषि क्षेत्र में विकास के बेरोजगारी पर
काबू पाना एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति लाना संभव नहीं है।
वातानुकूलित कमरे में बैठ कर मिट्टी में रहने वालों के लिए योजना बनाना कहां तक सफल है यह सर्वविदित है परिणाम यह हुआ कि देश अप्रत्यक्ष रूप से गुलामी के जंजीर में जकड़ता जा रहा है। ऐसा इसलिए कहना उचित होगा कि जब हम बाहर से आए लोगों के कम्पनीयों में रोजगार तलाश करेंगे और उनके द्वारा यहां से धन अपने देश को भेजें जाएंगे तो इस स्थिति को स्थाई और कारगर नहीं कहा जा सकता है। दूसरी ओर सरकार द्वारा किसानों की उपजाऊ भूमि अधिग्रहण कर बड़ी बड़ी कंपनियों को देना प्रगतिशील सोच नहीं कह सकते है क्योंकि इससे देश की उपजाऊ भूमि की कमी होगी और जिस क्षेत्र में उद्योग लगाया जाएगा वहां की फसलों पर इसका कुप्रभाव पड़ता है। सरकार चाहे तो उसर एवं बंजर भूमि पर कंपनियों को लगा कर फालतू पड़ी जमीन से फायदा कमा सकती है किन्तु नीति बनाने वालों को देश के किसानों की कम उद्योगपतियों की ज्यादा फिक्र है।
किसानों द्वारा लगातार उठ रही आवाज़ की कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाए वास्तविक में एक अच्छी मांग है और सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। सोचिए सरकार कृषि को उद्योग की श्रेणी में नहीं रखती जबकि किसानों द्वारा उपजाया गया खाद्य बाद में उद्योगपतियों के द्वारा अन्य चीजें बनाना उद्योग के श्रेणी में आता है । किसान द्वारा कठीन परिश्रम के बाद भी पूंजी निकालना जोखिम भरा काम है जबकि उद्योगपति सरकार से कई प्रकार के रियायत पा कर मलाई काट रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसान अपने उपज का मूल्य भी नहीं लगा पाता है और उसे औने-पौने दाम में अपने उपज बेचने पड़ते हैं जबकि उद्योगपति अपने सामान को अधिकतम खुदरा मुल्य पर बिक्री करता है और सरकार द्वारा किसानों के उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है। दूसरी ओर सरकार द्वारा संचालित क्रय केंद्रों पर समय से खरीददारी न होने से बिचौलियों की चांदी कटती है।
यदि कृषि को सरकार
द्वारा उद्योग का दर्जा दिया जाता तो किसान को कई तरह के रियायत मिलते साथ
ही उत्पादन,मुल्य , विपणन, वितरण पर अच्छी नीति बनने से किसानों को फायदा
होता जिससे अप्रत्यक्ष रूप से देश को फायदा होता।

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