महेंद्र मिश्रा ब्यूरो उत्तर प्रदेश
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि ई.वी.एम. मशीनों को लेकर जो संदेह और विवाद पैदा
हो गए हैं उससे चुनाव की सम्पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिह्न
लग रहा है। इससे ई.वी.एम. की जगह बैलट पेपर से चुनाव की मांग उठना
स्वाभाविक है। इस पर भाजपा सरकार का अड़ियल रवैया अनुचित है। समाजवादी
पार्टी ने अगला चुनाव बैलट पेपर से ही कराये जाने की मांग चुनाव आयोग से की
है।
इसमें दो राय नहीं कि आज राजनीतिक लाभ के लिए
टेक्नोलाॅजी का दुरूपयोग खुलकर हो रहा है। ‘टेक्नोलाॅजिकली लिटरेट‘ समाज को
भी जमकर ई.वी.एम. के दुरूपयोग पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। चुनावी
प्रक्रिया में मतपत्र का इस्तेमाल राज्य व नागरिक के बीच विश्वास के रिश्ते
को पारदर्शी और मजबूत बनाता है। इस रिश्ते के बीच ई.वी.एम. का आना उचित
नहीं। मतपत्र से मतदाता को भरोसा रहता है कि उसने जिसे मत दिया है, वो उसी
को मिला है। ये विश्वास ही लोकतंत्र की संजीवनी है। देश और लोकतंत्र के
भविष्य के लिए न केवल यह जरूरी है अपितु स्वच्छ राजनीति और जनता में चुनावी
प्रक्रिया की बहाली के लिए समय की पहली मांग भी है।
पिछले चुनावों और उपचुनावों में हजारों ई.वी.एम. में खराबी की शिकायतें
मिली थी। लम्बी-लम्बी कतारों में महिलाएं, नौजवान, किसान भरी धूप में अपनी
बारी के इंतजार में भूखे प्यासे खड़े रहे। ये तकनीकी खराबी है या चुनाव
प्रबंधन की विफलता या फिर जनता को मताधिकार से वंचित करने की साजिश। इस तरह
से तो लोकतंत्र की बुनियाद ही हिल जाएगी। लंदन में एक
साइबर विशेषज्ञ ने जो दावा किया है वह चैकाने वाला है। उसके अनुसार 2014
में लोकसभा चुनाव के अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात, सहित कई राज्यों में हुए
चुनावों में ई.वी.एम. के जरिए जबर्दस्त धांधली की गई। निष्पक्ष और स्वतंत्र
चुनाव की दृष्टि से इस पर जांच पड़ताल निष्पक्ष एवं स्वतंत्र ढंग से किए
जाने की जरूरत है। यह बेहद गंभीर मुद्दा भी है। यह पैसे की ताकत से
सत्ता को हथियाने की खतरनाक साजिश है।

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