ब्यूरो कानपुर रवि गुप्ता
पैगम्बर ए इस्लाम के दामाद, इस्लाम के चौथे खलीफा, शेरे खुदा
मुश्किल कुशा हज़रत मौला अली की शहादत पर खानकाहे हुसैनी हज़रत ख्वाजा
सैय्यद दाता हसन सालार शाह की 96/39 कर्नलगंज ऊँची सड़क स्थित दरगाह पर
कुरानख्वानी, मनकबत व नज़र पेशकर मौला अली को खिराज ए अकीदत पेश की गयी।
ज़ोहर की नमाज़ के बाद कुरानख्वानी हुई उसके बाद हज़रत ख्वाजा सैय्यद दाता हसन
सालार शाह की मज़ार पर गुलपोशी इत्र केवड़ा संदल पेश किया गया उसके बाद
शोरा ए कराम ने नात मनकबत पेश की जिसमेँ "रोती है काएनात के हैदर हुए शहीद
मस्जिद मे आज शाकी ए कौसर हुए शहीद मस्जिद में मुर्तजा तो बयां बान में
हुसैन दोनो ही जा नमाज़ के ऊपर हुए शहीद। शेरे खुदा हज़रत अली की शहादत पर
खिराज ए अकीदत पेश करते हुए उलेमा ए दीन ने कहा कि खामोश है तो दीन की
पहचान अली है अगर बोले तो लगता है कुरान अली है। हज़रत अली की विलादत 13 रजब
काबा शरीफ के अंदर हुई थी व 21 रमज़ानुल मुबारक 40 हिजरी को वो विसाल फरमा
गये विसाल के वक्त आपकी उम्र 63 साल थी आपकी नमाज़े जनाज़ा आपके बड़े शहज़ादे
हज़रते इमामे हसन ने पढ़ाई। खानकाहे हुसैनी के साहिबे सज्जादा इखलाक अहमद
डेविड चिश्ती ने कहा कि हज़रत अली को पैगम्बर ए इस्लाम अपना दोस्त बताते है
हज़रत अली कहते है कि कभी कामयाबी को दिमाग मे और नाकामी को दिल मे जगह न
देना क्योंकि कामयाबी दिमाग मे तकब्बुर और नाकामी दिल मे मायूसी पैदा कर
देती है, औलाद जब अपने माँ बाप को मोहब्बत की नज़रों से देखे तो वो भी इबादत
मे शुमार है, आपका पड़ोसी किसी भी मज़हब से ताल्लुक रखता हो अगर वो भूखा सो
गया तो हमारे रोज़े - नमाज़ को भी अल्लाह कबूल नही करेगा।
माँ बाप को नाराज़
कर नमाज़ रोज़े व सारी इबादते बेकार माँ बाप को खुश रखों अल्लाह तुम्हें खुश
रखेगा। पैगम्बर ए इस्लाम कहते है खुदा मेरा मौला है, मै हर मोमीन का मौला
हूँ मनकुंतो मौला जिसका मै मौला हूँ उसका अली मौला है, सरकार ने दुआ फरमाई
या अल्लाह जो अली से मोहब्बत करे तू उससे मोहब्बत कर और जो अली से अदावत
रखे तू उससे अदावत रख, नमाज़ के बारे मे उन्होंने कहा कि नमाज़ हमारे लिए ठीक
वैसे ही है जैसे एक भूखे के लिए खाना और प्यासे के लिए पानी ज़रुरी होता
नमाज़ इस्लाम का चेहरा है। हज़रत अली की जिन्दगी और उनके बताये रास्ते पर
चलने व नमाज़ की पाबंदी पर ज़ोर दिया अहले बैत से मोहब्बत करना कामयाबी व
जन्नत की सीढ़ी है। पंजतन पाक से मोहब्बत के बिना कोई इबादत पूरी नही हो
सकती खिताब के बाद नज़र मौला अली पेशकर दुआ हुई। नज़र व दुआ मे इखलाक अहमद
डेविड चिश्ती, हाफिज़ मोहम्मद कफील हुसैन, हाफिज़ मोहम्मद मुशीर रज़वी, फाज़िल
चिश्ती, मोहम्मद तौफीक, अफज़ाल अहमद, जमालुद्दीन, मोहम्मद जावेद, रौनक अली,
सैय्यद मोहम्मद तलहा, चाँद चिश्ती, अबरार वारसी, मोहम्मद इस्लाम, इरफान
अशरफी, नूर आलम वारसी, शमशुद्दीन, आज़म महमूद, मोहम्मद रईस, गुफरान मजीद,
नईमुद्दीन, एजाज़ रशीद, शारिक वारसी, चाँद कादरी, शकील अब्बा आदि सैकड़ो लोग
मौजूद थे।

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