जिला संवादाता अरविन्द शर्मा
सावन मास शुरू होते ही विभिन्न शिव मंदिरों में पूजा शुरू हो गई। वहीं
एक ऐसे शिव भक्त की बात करते हैं जो 3 कोस दूर सुरंग के रास्ते मंदिर में
जाकर भोले शंकर के शिवलिंग पर जलाभिषेक करते थे ।जिसका पुराणों में भी
वर्णन है और मंदिर आज भी ऐतिहासिक है। मंदिर में प्रतिवर्ष हजारों की
संख्या में भक्तगण पहुंचे और जलाभिषेक करते हैं हम बात कर
रहे हैं जनपद कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र के अंतर्गत पड़ने वाले
नारायणपुर सोडितपुर गांव की जहां पर द्वापर युग के समय बाणासुर का किला
बहुत ही ऐतिहासिक और विशाल किला था। 70 बीघे के क्षेत्रफल का किला बना हुआ
था। बाणासुर का परिवार उस किले में रहा करता था। उसकी बेटी ऊषा का विवाह
प्रद्युम्न के बेटे अनुरुद्ध के साथ हुआ। लेकिन इसी दौरान नारायणपुर में ही
भगवान श्री कृष्ण व बाणासुर के बीच युद्ध हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने
बाणासुर का वध कर दिया। गौरतलब हो कि बाणासुर भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त
था और जानकारों की माने तो अपनी बेटी के साथ लगभग 11 किलोमीटर लंबी सुरंग
के रास्ते से पैदल चलकर बाणेश्वर शिव मंदिर जिनई बानीपारा में जलाभिषेक
किया करता था। कहीं कहीं आज भी बारिश के समय पर वह सुरंग खेतों पर दिख जाती
है जहां से बाणासुर जिनई जाया करते थे। महल व महल के आसपास उस समय लगभग एक
सैकड़ा से अधिक पानी के कुए थे जिसमें 41 कुएं आज भी मौजूद है। ग्रामीणों
ने बताया कि गांव में बने कुएं में चरते समय दूसरे गांव के जानवर
चलते-चलते गिर जाते हैं लेकिन नारायणपुर गांव के जानवर कभी भी उन कुओं में
नही गिरे।
बारिश के मौसम के बाद खेरे पर कुछ न कुछ अजीब अवश्य देखने को
मिलता है। जैसे बारिश के बाद मानव कंकाल, बहूमूल्य मूर्तियां, मिट्टी के
बर्तन इत्यादि देखने को मिलते हैं। खेरे पर आज भी किले की आधारशिला है और
दीवारें भी देखने को मिलती है। वहीं बारिश के चलते भी गड्ढे के रूप में
कुएं दिखाई पड़ते हैं। यहां के लोग बताते हैं इस समय लगभग 52 बीघा का
खेड़ा है। जिसमें कभी बाणासुर का किला हुआ करता था। पास में ही एक विशाल
तालाब था। जहां पर बाणासुर की बेटी ऊषा स्नान करने के बाद जलाभिषेक करने के
लिए बाणेश्वर शिव मंदिर जिनई बानीपारा जाया करती थी। ग्रामीणों ने बताया
कि गांव में स्थित खेड़े में कहीं पर भी एक फावड़ा मारे तो विभिन्न प्रकार
के जीव देखने को मिल जाते हैं। जैसे काली बिच्छू आसानी से एक फावड़े में
ही बाहर निकल आती है। लेकिन कभी उन जीवों और बिच्छू ने किसी को हानि या
नुकसान नहीं पहुंचाया। स्थानीय लोगों ने बताया कि कि खेरे से निकली बहुत
ही पुरानी व हजारों साल पुरानी मूर्ति आज भी मंदिर में मौजूद हैं। जो
खेड़े की खुदाई और जमीन से निकली है। उन्होंने बताया कि स्वपन देकर खुदाई
करने पर विभिन्न प्रकार की मूर्तियां इस खेड़े से निकली है। नारायणपुर में
स्थित यह मंदिर आज भी आस्था विश्वास का प्रतीक बना हुआ। गौरतलब हो कि
द्वापर युग के समय काफी दिनों तक भगवान श्री कृष्ण बाणासुर का युद्ध चला और
अंत मे भगवान श्री कृष्ण ने बाणासुर का वध कर दिया। इतिहास के पन्नों में
दर्ज सोणितपुर को अब नारायणपुर के नाम से जाना जाता है। लेकिन
प्रशासनिक अनदेखी व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते यह प्राचीन पौराणिक
किला आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि
इतना प्राचीन और पौराणिक मंदिर हमारे गांव में है। लेकिन किसी भी
जनप्रतिनिधि व अधिकारी ने मंदिर के सुंदरीकरण सहित अन्य कार्यों के विषय
में नहीं सोचा।
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