पिछले दिनों कन्नौज की एक घटना की बिना किसी संदर्भ के सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेतृत्व ने चर्चा की। इसमें जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ उससे राजनीति की साख को भी बट्टा लगा। पद का अन्यथा इस्तेमाल सत्ता के दुरूपयोग की अवांछित दुर्घटना ही मानी जाएगी।
उत्तर प्रदेश में साढ़े तीन वर्षों में भाजपा सरकार ने अनावश्यक मुद्दों में उलझाकर राज्य का बहुत अहित किया है। जनता के साथ यह बड़ा छल और धोखा है। दिन प्रतिदिन प्रदेश में गम्भीर अपराधिक घटनाएं घट रही हैं। अपराधियों पर कोई अंकुश नहीं रह गया है। अपनी नफरत और समाज को बांटने वाली हरकतों को भाजपा छोड़ने का नाम नहीं लेगी क्योंकि उसी के सहारे उसकी सम्पूर्ण राजनीति संचालित होती है। भाजपा को आरएसएस निर्देशित करता है जिसका स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों से कोई नाता रिश्ता नहीं रहा है।
सच तो यह है कि भाजपा सरकार की हर मोर्चे पर विफलता जग जाहिर है। कानून व्यवस्था ध्वस्त है, कोरोना संक्रमण थम नहीं रहा है, अफसरशाही बेलगाम है और सत्ता दल के विधायक-सांसद भी अपनी सरकार के कामों पर उंगली उठा रहे हैं। इस सबसे त्रस्त मुख्यमंत्री जी ने सन् 2004 के लोकसभा चुनाव का सहारा लेकर अपने विरोध की दिशा मोड़ने का घटिया प्रयास किया है। लेकिन तब भी न तो वह जनता को बहका पाए थे और नहीं उसके वोट हथिया पाए थे। उनका ब्रम्हास्त्र अब उन्हीं के पास वापस आएगा।
मुख्यमंत्री को सत्य का आचरण का पालन करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में ऐसी पहली सरकार है जो सत्य के अलावा कुछ भी बोलती रहती है। लोकतंत्र में सरकारें संविधान के आधार पर ही चलती है। पर यहां तो भाजपा ने संविधान के प्रति सम्मान भाव को ठेस पहुंचाने का इरादा जाहिर कर दिया है। भाजपा को यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि लोकतंत्र मं जनता सर्वोपरि होती है। जनता भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा बहुत अच्छी तरह पहचान चुकी है।
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