उपेन्द्र कुमार पाण्डेय
अप्प दीपो भव’अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो
कहते हैं बुद्ध को जब ज्ञान प्राप्त हुआ तो वह सात दिन चुप रह गए। चुप्पी इतनी मधुर थी,ऐसी रसपूर्ण थी, ऐसा रोआं -रोआं उसमें नहाया - सराबोर था कि बोलने की इच्छा ही न जगी। बोलने का भाव ही पैदा न हुआ।
कहते हैं ब्रह्मा स्वयं घबरा गए, क्योंकि कल्प बीत जाते हैं, हजारों-हजारों वर्ष बीतते हैं, तब कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है। और ऐसा कोई बुद्ध न बोले , ऐसे शिखर से अगर बुलावा न दे तो जो नीचे अंधेरी घाटियों में भटकते लोग हैं, उन्हें तो शिखर की खबर भी न मिलेगी।इसलिए जो भी मौन का मालिक हो गया उसे बोलने के लिए मजबूर करना ही पड़ेगा।
कहते हैं, ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ बुद्ध के सामने मौजूद हुए। बुद्धत्व के चरणों में ब्रह्मा झुके और कहा- आप बोलें ! आप न बोलेंगे तो महा दुर्घटना हो जाएगी। और एक बार यह सिलसिला हो गया, तो आप परंपरा बिगाड़ देंगे। बुद्ध सदा बोलते रहे हैं। उन्हें बोलना ही चाहिए। जो न बोलने की क्षमता को पा गए हैं, उनके बोलने में कुछ अंधों को मिल सकता है, अंधेरे में भटकतों को मिल सकता है। आप चुप न हों, आप बोलें।
साधारण आदमी वासना से बोलता है, बुद्ध पुरुष करुणा से बोलते हैं। साधारण आदमी इसलिए बोलता है कि बोलने से शायद कुछ मिल जाए, बुद्ध पुरुष इसलिए बोलते हैं कि शायद बोलने से कुछ बंट जाए। बुद्ध इसलिए बोलते हैं कि तुम भी साझीदार हो जाओ उनके परम अनुभव में। पर पहले शर्त पूरी करना पड़ती है। मौन हो जाने की, शून्य हो जाने की।
जब ध्यान खिलता है, जब ध्यान की वीणा पर संगीत उठता है, जब मौन मुखर होता है, तब शास्त्र निर्मित होते हैं, जिनको हमने शास्त्र कहा है, वह ऐसे लोगों की वाणी है, जो वाणी के पार चले गये थे। और जब भी कभी कोई वाणी के पार चला गया, उसकी वाणी शस्त्र हो जाती है। आप्त हो जाती है। उससे वेदों का पुनः जन्म होने लगता है। इसलिए मौन को साधो ........
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