कृपा शंकर चौधरी ब्यूरो गोरखपुर तहकीकात न्यूज़
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आखिर किसान क्यो परेशान हैं जबकि समय समय पर सरकार द्वारा हरित क्रांति और कृषि नीति बनाने के दावे किए जाते हैं और प्रसंशा में किसान के लिए जय किसान के नारे एवं अन्न दाता जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इतना कुछ होने के बाद भी किसानों की आत्महत्याएं एवं बद से बद्तर होती स्थिती पर विराम नहीं लग सका है।आइए जानते की कोशिश करते हैं कि आखिर किसान की स्थिति ऐसी क्यो है ? दरअसल भारत में कुल श्रमशक्ति का 58 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं तथा कुल आबादी की 75 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर करता है इसके अलावा संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक व सर्वोत्तम कृषि योग्य भूमि व जलवायु भारत में उपलब्ध है इसके अलावा मानना है कि विश्व की कुल सिंचित कृषि क्षेत्र का 20 प्रतिशत भाग केवल भारत के पास है। भारत में 80.31 प्रतिशत किसान, सीमांत व लघु कृषक है जिनके पास कुल कृषि भूमि का मात्र 36 प्रतिशत है। यहां सिमांत से तात्पर्य उन किसानों से है जिनके पास ढाई एकड़ से भी कम कृषि योग्य भूमि है। कृषि की कम भुमि के कारण अपनी खेती के साथ अधिकांश किसानों को मजदूरी एवं अन्य कार्य भी करना होता है।
ठड्ढी ,
गर्मी , बरसात के मौसम से लड़ने के बाद एक बीज बोकर सैकड़ों बीज का उत्पादन
करने वाले इस किसान को क्या सरकार परिश्रम का उचित मूल्य दे पाती है उत्तर
होगा नहीं । माना जाता है कि कृषि का कार्य मौसम पर निर्भर करता है और
प्रकृति पर किसी का बस नहीं होने एवं आपदा की स्थिति में लड़ने के उत्तम
व्यवस्था न होने से भारतीय कृषि जूएं के खेल के समान है और असमान
परिस्थितियों में किसान कर्ज आदि के कारण टूट जाता है और आत्महत्या जैसे
जघन्य कृत्य करने पर विवस हो जाता है। यह तो बात रही हानि होने के संबंध
में किन्तु अच्छी पैदावार के बाद भी किसानों को समस्या का सामना करना पड़ता
है जैसे लागत से कम भाव मिलने पर किसान कर्ज में डूब जाता है और इस स्थिति
में भी आत्महत्या का रास्ता चुना जाता है।
विचारणीय
विषय है कि अन्नदाता कहे जाने वाले इस किसान की किसी भी सरकार के द्वारा
गहनता से अध्ययन करके समाधान निकालने की कोशिश नहीं किया गया यदि कुछ हुआ
तो कर्जमाफी और सब्सिडी देने जैसी प्रक्रिया जो कागजों एवं बिचौलियों तक
सिमट कर रह गई। वातानुकूलित कमरे में बैठ कर मिट्टी में रहने वाले इस किसान
के लिए कैसे नीति बन सकती है । कभी कभार कुकरमुत्ते की भांति पैदा होने
वाले किसान नेताओं द्वारा सरकार के सामने पक्ष रखा गया किन्तु नेताओं
द्वारा अपने सर्वार्थ सिद्धि के बाद मूल मांगों को दबा दिया गया। दरअसल
पूंजीपति एवं इनके पिछलग्गू राजनेता जानते हैं कि जिस दिन किसान सबल हो गया
भारत से भुखमरी बेरोजगारी एवं अपराध खत्म हो जाएगा और नेताओं के आज की तरह
मिलने वाले साज शौकत एवं पीछे जुटने वाली भीड़ खत्म हो जाएगी।
सरकार
रोना रोती है कि हमनें किसानों के लिए फलां कर्ज माफी किया और इतना सबसिडी
दिया जिससे सरकार के बजट से इतना नुक्सान हुआ। सरकार से पूछने का विषय है
कि क्या जरूरत है इतना बजट रेवड़ियों की भांति बांटने की, कुछ इस तरह की
नीति क्यो नही बनाते कि किसान आत्मनिर्भर बन जाए और सब्सिडी लेने की जगह
इनकम टैक्स देने योग्य हो जाए जिससे देश का और विकास हो सके।
उपरोक्त
बातों में कल्पना नजर आती है किन्तु वास्तविकता में इसे धरातल पर पिरोया
जा सकता है। कमी बस इतनी है कि नीतियों में सर्वार्थ न हो और उसे जनता एवं
देशहित में बनाया जाएं।

No comments:
Post a Comment
तहकीकात डिजिटल मीडिया को भारत के ग्रामीण एवं अन्य पिछड़े क्षेत्रों में समाज के अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों को एक मंच प्रदान करने के लिए निर्माण किया गया है ,जिसके माध्यम से समाज के शोषित ,वंचित ,गरीब,पिछड़े लोगों के साथ किसान ,व्यापारी ,प्रतिनिधि ,प्रतिभावान व्यक्तियों एवं विदेश में रह रहे लोगों को ग्राम पंचायत की कालम के माध्यम से एक साथ जोड़कर उन्हें एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया जायेगा एवं उनकी आवाज को बुलंद किया जायेगा।