रिपोर्ट - कृपा शंकर चौधरी
कानून का खौफ ना होना कहे या प्रशासन की शिथिलता जिसके
कारण लोगों द्वारा आएदिन सार्वजनिक जमीन कब्जाने की खबर आती रही है।इसी
क्रम में गोरखपुर के रेलवे कालोनी स्थित आर्य समाज मंदिर के संरक्षक राम
छविला प्रसाद यादव ने आरोप लगाया है कि कुछ लोगों द्वारा कूट रचित ढंग से
मंदिर की संपत्ति बेचने के बाद अब मंदिर में भी ताला लगा दिया गया है जिससे
समाज के लोगों को बाहर बैठकर पूजा और यज्ञ करना पड़ता है।गौरतलब
है कि गोरखपुर के असुरन रेलवे कालोनी स्थित 1940 से स्थापित आर्य समाज वेद
मंदिर स्थापना दिवस से ही पूजा एवं विद्यालय के रूप में कार्य कर रही थी
किन्तु अब रविवार पूजा के दिन ताला लगने से आर्य समाज के श्रद्धालुओं को
पूजा पाठ करने से वंचित किया जा रहा है।मंदिर के
संरक्षक राम छबीला प्रसाद यादव ने बताया कि मंदिर के कथित पदाधिकारी बनकर
त्रियुगीनारायण पाठक , भगवान सिंह , एवं रामसूरत चौधरी के द्वारा मंदिर के
एक अन्य भूमि आर्य कन्या विद्यालय वसारतपुर को कूट रचित ढंग से बेच दिया
गया जिस संबंध में शासन प्रशासन को अवगत कराया गया किन्तु इन लोगों कीऊंची
पहुंच के कारण पुख्ता सबूत होने के वावजूद जांच को प्रभावित कर उच्च
अधिकारियों एवं माननीय मुख्यमंत्री को अंधेरे में रख दिया गया और अब वेद
मंदिर को भी कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है।
रामछबिला
ने बताया कि हालांकि कूट रचित ढंग से बेची गई संपत्ति के मामले में मुकदमा
दर्ज किया गया है किन्तु अब वेद मंदिर में भी कब्जे के दृष्टिगत ताला
लगाने से समाज के लोग आहत हैं एवं बाहर बैठकर पूजा करने को बाध्य है।
उन्होंने बताया कि आर्य प्रतिनिधि सभा लखनऊ के द्वारा कई बार पत्र लिखकर
यह स्पष्ट किया गया है कि यह लोग मान्य प्रतिनिधि नहीं है एवं इनके द्वारा
गलत ढंग से जमीन बेची गई किन्तु पहुंच के कारण इन पत्रों को दरकिनार किया
जा रहा है।इसके अलावा समाज मंत्री नंदलाल यादव के
द्वारा कई तथ्य प्रस्तुत किए गए जो वास्तव में इसके पीछे साजिश होने के
संदेह उत्पन्न करतें हैं ।नन्दलाल यादव ने बताया कि
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा चिटफंड सोसायटी गोरखपुर को 60 दिनों के अंदर
इस मामले को निस्तारण के निर्देश दिए गए किन्तु लगभग 700 दिन बीतने के
बावजूद कुछ नहीं हुआ इसके अलावा चिटफंड सोसायटी के अफसरों द्वारा साक्ष्य
के रूप में प्रस्तुत अभिलेखों के साथ भी छेड़छाड़ के आरोप लगाया गया है।
नन्दलाल यादव ने राम छबिला प्रसाद यादव के द्वारा दिए गए त्याग पत्र की मूल
प्रति दिखाते हुए कहा कि साजिशकर्ताओं द्वारा इसके छायाप्रति में दिनांक
और हस्ताक्षर के साथ छेड़छाड़ किया गया है।इन कथनों
एवं साक्ष्यों को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह मामला कहीं न कहीं से
संदिग्ध है एवं प्रशासनिक महकमे पर भी उंगली उठना जायज है ।
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