विकाश कुमार पांडेय
भारत की धरती पर 22 मई 1878 में एक ऐसे पहलवान का जन्म हुआ था।जिसने अपनी ताकत का लोहा मनवाया।उसका नाम सुनकर बड़े बड़े पहलवान मैदान छोड़कर अपनी हार स्वीकार कर लेते थे।पूरी दुनिया में गामा पहलवान के नाम से मशहूर हुआ इस पहलवान के एक दिन में 10
लीटर दूघ, आधा लीटर घी, भारी मात्रा में बादाम और जूस। इसके अलावा हर दिन 6 किलो चिकन करीब 100 रोटियां खा जाए ऐसा अब कोई इंसान नहीं होगा। लेकिन, आज से करीब 80 साल पहले ये एक इंसान का दैनिक आहार था। इस शख्स को ‘रुस्तम-ए-जमां’ नाम से जाना जाता है। लेकिन इनका सबसे मशहूर नाम गामा पहलवान है, ‘शेर-ए-पंजाब और ‘द ग्रेट गामा’ जैसे नामों से अलंकृत किए गए थे।
आज की तारीख में पंजाब के अमृतसर में जन्मे गुलाम मुहम्मद के गामा पहलवान बनने की एक अलग ही कहानी है। लेकिन, देश के विभाजन यानी साल 1947 के बाद गामा पहलवान भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हो गए। पिता मुहम्मद अजीज भी एक पहलवान थे, इसलिए गामा पहलवान की रग-रग में पहलवानी बसी थी।
गामा पहलवान ने शुरुआत में कुश्ती के दांव-पेंच पंजाब के मशहूर ‘पहलवान माधो सिंह’ से सीखे। लेकिन, इसके बाद उनकी किस्मत बदल गई और उन्हें दतिया के महाराजा भवानी सिंह ने पहलवानी करने की सुविधायें दीं। आजादी के पहले तक गामा पहलवान ने भारत का नाम पूरे विश्व में ऊंचा रखा। कश्मीरी ‘बट’ परिवार से नाता रखने वाले गामा पहलवान के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह विश्व में एकमात्र ऐसे पहलवान हैं जिन्होंने अपने जीवन में कोई कुश्ती नहीं हारी।
5 फुट 7 इंच के औसत लंबाई वाले गामा पहलवान ने उस दौर में विश्व के लगभग हर लंबे पहलवान को पटकनी दी थी। महज 19 साल की उम्र में ही ‘रहीमबख्श सुल्तानी वाला’ जैसे दिग्गज पहलवान को चारों खाने चित कर दिया था। अद्वितीय शक्ति,व फुर्ती से रहीमबख्श सुल्तानीवाला पहलवान को हराने के बाद गुलाम मुहम्मद यानी गामा पहलवान का नाम भारत ही नहीं बल्कि विश्व में तेजी से फैल गया।
विश्व दंगल में गामा पहलवान ने अमेरिका के पहलवान ‘बैंजामिन रोलर’ और विश्व विजेता पहलवान पोलैण्ड के स्टेनली जिबिस्को को भी धूल चटाई थी। विश्व विजेता पहलवान स्टेनली जिबिस्को के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह गामा पहलवान से ज्यादा वजनी थी। बावजूद इसके वो गामा पहलवान से डरते थे। बताया जाता है कि एक बार तो पोलैंड का यह दिग्गज पहलवान मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ था।
द ग्रेट गामा दुनिया के सबसे महान रेसलर में से एक थे। पांच दशक से लंबे पहलवानी करियर में वे अजेय थे। हैरान करने वाली बात ये थी कि वे दिन में 5000 उठक-बैठक और 1000 से ज्यादा दंड लगाते थे। दुनिया के इस पहलवान की मौत 23 मई 1960 में पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था।


No comments:
Post a Comment
तहकीकात डिजिटल मीडिया को भारत के ग्रामीण एवं अन्य पिछड़े क्षेत्रों में समाज के अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों को एक मंच प्रदान करने के लिए निर्माण किया गया है ,जिसके माध्यम से समाज के शोषित ,वंचित ,गरीब,पिछड़े लोगों के साथ किसान ,व्यापारी ,प्रतिनिधि ,प्रतिभावान व्यक्तियों एवं विदेश में रह रहे लोगों को ग्राम पंचायत की कालम के माध्यम से एक साथ जोड़कर उन्हें एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया जायेगा एवं उनकी आवाज को बुलंद किया जायेगा।