राजेश सिंह, सदस्य
प्रउत गोलबल
पैकेज, आर्थिक पाखंड और प्रउत
12 मई को रात्री 8 बजे टेलीविज़न पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले ही 20-20 खेलते हुये, तकरीबन 2500 शब्दों की मैराथन पारी में कई नई उपमायें, नये अलंकृत शब्दावली गढ़ते हुये, आर्थिक पैकेज के संदर्भ में सिर्फ एकबार 'मजदूर' शब्द का प्रयोग कर उन्होंने मजदूरों के प्रति अपनी और सरकार की संवेदना तथा प्राथमिकता सूची में उनके स्थान को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर दिया। अगले दिन, अर्थात 13 मई, 2020 को, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार का कसीदा पढ़ने के साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिये तीन लाख करोड़ की आर्थिक सहायता सहित अन्य घोषणाएं तो की, परन्तु मजदूर और गरीब लोग यहां भी उपेक्षित ही रहे।
सरकार समर्थक मीडिया भी रेलवे ट्रैक और रास्ते में मर रहे प्रवासी मजदूर, उनकी बदहाल स्थिति पर चर्चा के बजाय, सरकार और सरकार द्वारा घोषित बीस लाख करोड़ रुपये के पैकेज के गुणगान और महिमामंडन में व्यस्त है। जबकि सच्चाई यह है कि बीस लाख करोड़ रुपये का यह पैकेज आंकड़ों की बाजीगरी और आर्थिक पाखंड भर है। पिछले कुछ समय में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा घोषित वित्तीय प्रोत्साहन के साथ शुरू हुई किश्त दर किश्त घोषणाएं और वर्तमान की कई योजनाओं में किये जाने वाले तमाम खर्च को जोड़कर इसे 'महापैकेज' बनाने की चालाक कोशिश की गयी है।
इस आर्थिक पाखंड के गणित को थोड़ा समझने की कोशिश करते हैं। 6 फरवरी, 2020 को भारतीय रिज़र्व बैंक ने 2.8 लाख करोड़ रुपये, जो कि सकल घरेलू उत्पाद का 1.4% है, की बैंकिंग व्यवस्था में नकदी बढ़ाने की घोषणा की। 27 मार्च, 2020 को रिज़र्व बैंक ने पुनः कई उपायों के माध्यम से 3.74 लाख करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 1.8%, की नकदी बढ़ाने की घोषणा की। 17 अप्रैल को एक लाख करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 0.5%, और 27 अप्रैल को, प्राइवेट म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी फ्रैंकलिन टेम्पलटन के डूबने की आशंकाओं के बीच, म्यूच्यूअल फंड्स के लिये 50,000 करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 0.25%, की विशेष नकदी सुविधा प्रदान की। इन सबका सामूहिक मूल्य 8.04 लाख करोड़ रुपये और सकल घरेलू उत्पाद का 3.95% होता है।
27 मार्च, 2020 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 1.70 लाख करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 0.85%, के राजकोषीय सहायता की घोषणा की। इसमें भी आंकड़ों की बाजीगरी दिखाने से सरकार नहीं चूकी। इसमें आगामी महीनों में दिये जाने वाले महिला जनधन योजना का 10,000 करोड़ रुपया, विधवा, वृद्ध और अपंग कोष में दिया जाने वाला 3,000 करोड़ रुपया, प्रधानमंत्री कृषक सम्मान योजना का 17,380 करोड़ रुपया और निर्माण क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण निधि का 31,000 करोड़ रुपया, जो 61,380 करोड़ रुपया होता है, को इस 1.70 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा बना दिया गया। बाकी बचे एक लाख करोड़ रुपये का क्या होगा, इसकी कोई स्पष्ट सूचना नहीं है।
मतलब, 12 मई, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब टेलीविज़न के प्राचीर से 20 लाख करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 10%, की उदघोषणा कर रहे थे, तब भारतीय रिज़र्व बैंक का 8.04 लाख करोड़ रुपया और सरकार द्वारा घोषित 1.70 लाख करोड़ रुपया अर्थात 9.74 लाख करोड़ रुपये, सकल घरेलू उत्पाद का 4.8%, की औपचारिक घोषणा पहले ही कि जा चुकी थी। यह प्रधानमंत्री द्वारा पुराने घोषित पैकेज की एकबार वाहवाही लूट लेने के बाद, दुबारा वाहवाही लूटने की क्षद्म कोशिश या आर्थिक पाखंड था।
13 मई, 2020 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिये 3 लाख करोड़ रुपये के साथ साथ तकरीबन 6 लाख करोड़ रुपये की अन्य सहायता घोषणाएं की। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को दिये जाने वाले 3 लाख करोड़ रुपये की कहानी से 6 लाख करोड़ रुपये की कहानी को समझा जा सकता है। यह 3 लाख करोड़ रुपया कोई बेलआउट पैकेज नहीं बल्कि सरकार द्वारा दी गयी क्रेडिट गारंटी है। मतलब, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग कुछ भी गिरवी रखे बगैर कर्ज़ ले सकते हैं। और कर्ज के डूबने की स्थिति में सरकार बैंकों को इसकी भरपाई करेगी। दूसरा, जिन 45 लाख उद्योगों को फायदा पहुंचने की बात की जा रही है वह बड़े उद्योग हैं। 6.3 करोड़ सूक्ष्म और लघु उद्योगों को इसका फायदा नहीं मिलेगा। सरकार का संदेश साफ है कि जिनका पेट भरा हुआ है उन्हें ही भोजन देना है और जो भूख से मर रहे हैं, उनकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यदि सरकार चाहती तो इन तीन लाख करोड़ रुपये से, वित्त वर्ष 2020-21 में, 13.62 करोड़ मनरेगा जॉब कार्ड होल्डर्स को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध करा सकती थी। और मजदूरों को मिला यह पैसा सीधे सीधे अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनता।
पूंजीवादी केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था आर्थिक समस्याओं में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी ही करेगी क्योंकि मंदी की वर्तमान समस्या उत्पादन की नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के पास खरीदने की क्षमता या क्रयशक्ति का अभाव है। दुःखद यह कि सरकारें उपभोक्ता की क्रय क्षमता बढ़ाने के बजाय उत्पादन बढ़ाने की ही पुरजोर कोशिश कर रही हैं। रिज़र्व बैंक ने विभिन्न वित्तीय नीतियों के माध्यम से बैंकिंग क्षेत्र में 8.04 लाख करोड़ रुपये की नकदी और सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिये 3 लाख करोड़ रुपये को सुविधा तो दे दी गयी, परन्तु उद्योग जगत कर्ज़ लेने के लिये आगे नहीं आ रहा है। उद्योग जगत को यह बात अच्छी तरह मालूम है कि उपभोक्ता अभी जीवन रक्षक वस्तुओं; अनाज, भोजन, दवाई आदि पर ही खर्च करेगा।
एक देशी कहावत है कि अगर किसी को भूत पकड़ ले तो उसे सरसों से भगाते हैं परन्तु सरसों में ही भूत घुस जाये, तो फिर? पूंजीवादी व्यवस्था में असीमित धन संचय और अधिकतम लाभ का लालच, दो ऐसे भूत हैं, जिन्हें निकालना नामुमकिन है। बड़ी समस्या यह है कि हर देश की सरकार इन्हीं पूंजीपतियों द्वारा पोषित होती हैं। राजनैतिक दलों को चुनाव के लिये बेतहाशा धन पूंजीपति ही मुहैया कराते हैं और चुनाव जीतने के बाद सरकार जनता जनता तो करती है, परन्तु हित और स्वार्थ सिर्फ पूंजीपतियों का ही साधती है। ऐसे में यक्ष प्रश्न है कि "क्या कोई विकल्प है?"
श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रतिपादित सामाजिक आर्थिक दर्शन 'प्रगतिशील उपयोग तत्त्व (प्रउत)' का आर्थिक लोकतंत्र और विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था ही वर्तमान आर्थिक समस्याओं का एकमात्र निदान है।
प्रउत की अर्थव्यवस्था में विकास की यात्रा ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर की ओर जाती है। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और अहमदाबाद आदि के समृद्ध होने से बात नहीं बनती बल्कि देश के 6,49,481 गांवों को विकसित करना होगा। एक प्रखंड के अंदर आने वाले सभी गांवों को आधार बनाकर विकास की योजना स्थानीय स्तर पर बनानी होगी और स्थानीय लोगों द्वारा उसका क्रियान्वन भी करना होगा। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और शहरों को होने वाला पलायन भी रुकेगा। विभिन्न सरकारों ने उत्पादन बढ़ाने के नाम पर मजदूरों की मजदूरी बढ़ाये बगैर काम का समय 8 घन्टा से बढ़ाकर 12 घन्टा कर दिया। प्रउत कि अर्थव्यवस्था में एक आदमी से अमानवीय रूप से 12 घन्टा काम कराने की बजाय दो लोगों से 6-6 घन्टा काम कराया जाता ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके। आज श्रम आधारित ज्यादा से ज्यादा आधारभूत योजनाओं को चलाने की आवश्यकता है जिससे ज्यादा लोगों को रोजगार मिले और वह अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं; अन्न, वस्त्र, चिकित्सा, शिक्षा और आवास आदि खरीद सके।
प्रउत के आर्थिक लोकतंत्र का मार्ग प्रत्येक नागरिक के रोजगार, प्रगति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है जो स्वतः ही एक सशक्त और स्वालम्बी राष्ट्र निर्माण में सहायक होगा।
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