रिपोर्ट -मोबिन मंसूरी
एक हजार साल बाद 18 देशों से 44 विदेशी मेहमान खुशबू के शहर कन्नौज में पहुंचे। यहां की मिट्टी में उन्हें अपनों की महक आई। इतने भावुक हुए कि न केवल मिट्टी को चूमा बल्कि अपने साथ भी ले गए। कहा कि हम इस मिट्टी के ऋणी हैं क्यों कि यहां हमारे पूर्वजों ने जन्म लिया था। सिद्धपीठ मां काली देवी के दर्शन और पूजन भी किया। बताया कि पूर्वज मां काली के उपासक थे और वह भी नवरात्र में व्रत रखते हैं। अपने पुरखों की मिट्टी को चूमने पहुंचे विदेशी मेहमानों ने यहां मकरंद नगर स्थित काली मंदिर का दर्शन किया। टीम में शामिल सर्बिया की माजा फैमिलिक ने बताया कि उनके घर में यहां की यादें हैं। उनके पूर्वज इस मंदिर का जिक्र करते रहे हैं।
इतिहास के झरोखे से जानकारी जुटाकर यहां पहुंचे अलग-अलग मुल्कों फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, लतीवा, रूस, सर्बिया, हंगरी, क्रोएशिया, स्वीडन, नीदरलैंड, इटली, अल्बानिया, रोमानिया, तुर्की, पोलैंड सहित
कई मुल्कों से आए 40 से ज्यादा विदेशी मेहमान खुशबू के शहर कन्नौज में थे।
ये विदेशी मेहमान यहां के प्राचीन सिद्धपीठ मां काली के मंदिर पहुंचे।
जहां यह लोग पूरी तरह से भक्ति रस में डूबे देखे गए। अपने पुरखों की मिट्टी
को प्रणाम करते हुए देवी दरबार में यह लोग जमकर झूमे। अंतराष्ट्रीय सहयोग
परिषद की सदस्य डॉ. रजनी सरीन ने बताया कि इनके पूर्वज यहीं कन्नौज के थे।
अब से एक हजार साल पहले 1018 में सुल्तान महमूद गजनवी की फौज उन्हें यहां
से अपने मुल्क ले गई थी। उसके बाद से वह लोग वहीं होकर रह गए और बाद में
अलग-अलग मुल्कों में उनका दायरा बढ़ा। लेकिन अपने मुल्क से मोहब्बत कम नहीं
हुई। अपनी नई पीढ़ियों को कन्नौज की कहानी बताते रहे। यही वजह है कि अब एक
हजार साल बाद भी उनके वंशज कन्नौज से लगाव रखते हैं। इनके पूर्वज मां काली
के उपासक थे और वह भी नवरात्र में व्रत रखते हैं। अपने पुरखों की मिट्टी को
चूमने पहुंचे विदेशी मेहमानों ने यहां मकरंद नगर स्थित काली मंदिर का
दर्शन किया। टीम में शामिल सर्बिया की माजा फैमिलिक ने बताया कि उनके घर
में यहां की यादें हैं। उनके पूर्वज इस मंदिर का जिक्र करते रहे हैं।
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