मीडिया डेस्क
सीबीआई अफसरों ने बृहस्पतिवार को बताया कि 250 पदों के लिए हुई उक्त भर्ती में लोकसेवकों के करीबी रिश्तेदारों को तरजीह देने का आरोप है। यह सभी अधिकारी 2007 से 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं मायावती के दौर में सत्ता के करीबी माने जाते थे। आरोप था कि यूपीपीएससी के कुछ अधिकारियों ने न्यूनतम अर्हता पूरी न होने के बावजूद कई लोगों की भर्ती कर ली। मानकों की अनदेखी कर जिनकी भर्ती की गई, उनमें सचिवालय में तैनात कई निजी सचिवों के नजदीकी रिश्तेदारों के नाम सामने आए। अयोग्य उम्मीदवारों का चयन करने के लिए परीक्षकों पर भी उनके प्राप्तांक में फेरबदल करने का दबाव बनाया था। सूत्र बताते हैं कि सीबीआई के हाथ जो दस्तावेज लगे उनमें यहां तक की जानकारी मिली कि अपनों को नियुक्ति दिलाने में बड़े अफसरों ने एक्ट तक में संशोधन कर चहेतों की खातिर भर्ती में खूब मनमानी की। गौरतलब है कि यह मामला सीबीआई में न जाए इसके लिए सचिवालय के ही एक ग्रुप ने खासा जोर लगा रखा था।सीबीआई अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस मामले में लोक सेवक शब्द का प्रयोग निर्वाचित प्रतिनिधि यानी विधायक या मंत्री के लिए किया गया है या किसी अन्य के लिए। लेकिन उन्होंने इस सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की कि चुने गए उम्मीदवारों के ‘करीबी रिश्तेदार’ सरकार के निर्वाचित सदस्य थे या नहीं।
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